Lord Hanuman was the son of Anjani and Maruti, born with the blessings of 'Vayu', the wind god (Pavan). He is considered to be an avatar (incarnation) of Lord Shiva . Lord Hanuman was the only learned scholar who knew the nine Vyakaranas. He learned the shastras from Suryadev, the sun god. He is well versed with the Vedas and other sacred books. From his birth onwards, he exhibited extraordinary physical strength and worked many miracles. There are various instances in the scriptures about his childhood. Once as a child, looking at the sun Anjaneya thought it was a fruit. He flew up to eat it, and swallowed the sun. The universe plunged into darkness. Angered by his action, Lord Indra attacked Anjaneya with his 'Vajrayudha' . Anjaneya was hurt on his chin (known as 'Hanu' in sanskrit). This is how he got the name Hanuman, which is his most commonly used name. Seeing his son hurt, the wind god Pavan was very upset and threatened to withdraw 'Pranvayu' oxygen) from the Universe. Terrified by this threat the gods came to appease 'Vayu'. They each conferred a boon upon the little Hanuman. He was blessed with courage, superhuman strength and valour. Hanuman as Ram-bhakta Hanumanji is the symbol of Devotion and Service to Lord Rama. Hanuman was the chief of the armies of Sri Ramachandra and took a prominent part in the war against Ravana, the king of Lanka, in Ramayana. Hanuman helped restore Sita Devi back to Sri Rama. Worship of Sri Rama is complete only with the worship of Hanuman. Monday, March 16, 2009
Childhood of Lord Hanuman
Lord Hanuman was the son of Anjani and Maruti, born with the blessings of 'Vayu', the wind god (Pavan). He is considered to be an avatar (incarnation) of Lord Shiva . Lord Hanuman was the only learned scholar who knew the nine Vyakaranas. He learned the shastras from Suryadev, the sun god. He is well versed with the Vedas and other sacred books. From his birth onwards, he exhibited extraordinary physical strength and worked many miracles. There are various instances in the scriptures about his childhood. Once as a child, looking at the sun Anjaneya thought it was a fruit. He flew up to eat it, and swallowed the sun. The universe plunged into darkness. Angered by his action, Lord Indra attacked Anjaneya with his 'Vajrayudha' . Anjaneya was hurt on his chin (known as 'Hanu' in sanskrit). This is how he got the name Hanuman, which is his most commonly used name. Seeing his son hurt, the wind god Pavan was very upset and threatened to withdraw 'Pranvayu' oxygen) from the Universe. Terrified by this threat the gods came to appease 'Vayu'. They each conferred a boon upon the little Hanuman. He was blessed with courage, superhuman strength and valour. Hanuman as Ram-bhakta Hanumanji is the symbol of Devotion and Service to Lord Rama. Hanuman was the chief of the armies of Sri Ramachandra and took a prominent part in the war against Ravana, the king of Lanka, in Ramayana. Hanuman helped restore Sita Devi back to Sri Rama. Worship of Sri Rama is complete only with the worship of Hanuman. Lord Hanuman
Lord Hanuman is the Supreme Lord, for acquiring knowledge, physical and mental strength, truthfulness, sincerity, selflessness, humility, loyalty, and profound devotion to the Lord. Hanumanji is known by many names as Anjaneya, Anjani Putra, Bajarangbali, Hanuman, Mahaveer, Marutinandan, Pavanputra etc. Hanuman, worshipped for his strength, valor, agility, is a man of great teaming. Lord Hanuman is fast - the most agile and oriented god. He has exhibited astonishing physical strength and worked many miracles. His valour, wisdom, knowledge of the scriptures and superhuman strength attracted everybody who came near him. He had extraordinary skill in warfare. Hanmanji was a bachelor (brahamachari) and is worshipped in all the temples of India. Every temple of Shri Ram contains an icon of Hanuman. Worship of Sri Rama is complete only with the worship of Hanuman. References to Hanuman in classical literature could be found as early as those of 5th to 1st century BC in Panini's Astadhyayi, Abhiseka Nataka, Pratima Nataka and Raghuvamsa (Kalidasa)श्री हनुमान चालीसा
दोहाश्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥बुध्दिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार ।बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार ॥चौपाईजय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपिस तिहुँ लोक उजागर ॥राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनि-पुत्र पवन सुत नामा ॥महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥कंचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुंडल कुंचित केसा ॥हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै कांधे मूँज जनेऊ साजै ॥संकर सुवन केसरीनंदन । तेज प्रताप महा जग बंदन ॥बिद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लषन सीता मन बसिया ॥सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥भीम रूप धरि असुर सँहारे । रामचंद्र के काज सँवारे ॥लाय सजीवन लखन जियाये । श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥सहस बदन तुम्हरो जस गावैं । अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ॥जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते । कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥तुम्हरो मन्त्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥जुग सहस्त्र जोजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रच्छक काहू को डर ना ॥आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥भूत पिसाच निकट नहिँ आवै । महाबीर जब नाम सुनावै ॥नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥संकट तें हनुमान छुडावै । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥सब पर राम तपस्वी राजा । तिन के काज सकल तुम साजा ॥और मनोरथ जो कोइ लावै । सोइ अमित जीवन फल पावै ॥चारों जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता ॥राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ॥अंत काल रघुबर पुर जाई । जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई ॥और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेंइ सर्ब सुख करई ॥संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥जै जै जै हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरु देव की नाईं ॥जो सत बर पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महा सुख होई ॥जो यह पढ़ै हनुमान चलीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥दोहापवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप ।राम लषन सीता सहित,हृदय बसहु सुर भूप ॥
***
श्री हनुमान जी की आरती
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥ आरती……जाके बल से गिरिवर काँपै। रोग-दोष जाके निकट न झाँपै ॥1॥
अंजनी पुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई ॥2॥
दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाए ॥3॥
लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई ॥4॥
लंका जारि असुर संहारे। सियारामजी के काज सँवारे ॥5॥
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि सजीवन प्रान उबारे ॥6॥
पैठि पाताल तोरि जम-कारे। अहिरावन की भुजा उखारे ॥7॥
बाएं भुजा असुर दल मारे। दहिने भुजा संतजन तारे ॥8॥
सुर नर मुनि आरती उतारें। जै जै जै हनुमान उचारें ॥9॥
कंचन थार कपूर लौ छाई। आरति करत अंजना माई ॥10॥
जो हनुमानजी की आरति गावै। बसि बैकुण्ठ परम पद पावै ॥11॥***
आरती श्री रामायणजी की
आरति श्री रामायण जी की ।कीरति कलित ललित सिय-पी की ॥ आरति……गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद ।बालमीक बिज्ञान बिसारद ॥सुक सनकादि शेष अरू सारद ।बरनि पवनसुत कीरति नीकी ॥ आरति……गावत वेद पुरान अष्टदस ।छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस ॥सार अंस सम्मत सबही की ॥ आरति……गावत संतत संभु भवानी ।अरू घटसंभव मुनि बिग्यानी ॥व्यास आदि कविबर्ज बखानी ।कागभुसुंडि गरूड़ के ही की ॥ आरति……कलिमल हरनि विषय रस फ़ीकी ।सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की ॥दलन रोग भव मूरि अमी की ।तात मात सब बिधि तुलसी की ॥ आरति……श्रीसालासर हनुमान जी की आरती
जयति जय जय बजरंग बाला, कृपा कर सालासर वाला ॥चैत सुदी पूनम को जन्मे, अंजनी पवन खुशी मन में ।प्रकट भए सुर वानर तन में, विदित यश विक्रम त्रिभुवन में ।दूध पीवत स्तन मात के, नजर गई नभ ओर ।तब जननी की गोद से पहुंच, उदयाचल पर भोर ।अरुण फल लखि रवि मुख डाला ॥ कृपा कर…तिमिर भूमण्डल में छाई, चिबुक पर इंद्र वज्र बाए ।तभी से हनुमत कहलाए, द्वय हनुमान नाम पाए ।उस अवसर में रुक गयो, पवन सर्व उन्चास ।इधर हो गयो अंधकार, उत रुक्यो विश्व को श्वास ।भए ब्रह्मादिक बेहाला ।। कृपा कर…देव सब आए तुम्हारे आगे, सकल मिल विनय करन लागे ।पवन कू भी लाए सांगे, क्रोध सब पवन तना भागे ।सभी देवता वर दियो, अरज करी कर जोड़ ।सुनके सबकी अरज गरज, लखि दिया रवि को छोड़ ।हो गया जग में उजियाला ॥ कृपा कर…रहे सुग्रीव पास जाई, आ गए वन में रघुराई ।हरी रावण सीतामाई, विकल फिरते दोनों भाई ।विप्र रूप धरि राम को, कहा आप सब हाल ।कपि पति से करवाई मित्रता, मार दिया कपि बाल ।दुःख सुग्रीव तना टाला ॥ कृपा कर…आज्ञा ले रघुपति की धाया, लंक में सिंधु लांघ आया ।हाल सीता का लख पाया, मुद्रिका दे वनफल खाया ।वन विध्वंस दशकंध सुत, वध कर लंक जलाय ।चूड़ामणि संदेश सिया का, दिया राम को आय ।हुए खुश त्रिभुवन भूपाला ॥ कृपा कर…जोड़ी कपि दल रघुवर चाला, कटक हित सिंधु बांध डाला ।युद्ध रच दीन्हा विकराला, कियो राक्षसकुल पैमाला ।लक्ष्मण को शक्ति लगी, लायौ गिरी उठाय ।देइ संजीवन लखन जियाए, रघुबर हर्ष सवाय ।गरब सब रावन का गाला ॥ कृपा कर…रची अहिरावन ने माया, सोवते राम लखन लाया।बने वहां देवी की काया, करने को अपना चित चाया ।अहिरावन रावन हत्यौ, फेर हाथ को हाथ ।मंत्र विभीषण पाय आप को, हो गयो लंका नाथ ।खुल गया करमा का ताला ॥ कृपा कर…अयोध्या राम राज्य कीना, आपको दास बना दीना ।अतुल बल घृत सिंदूर दीना, लसत तन रूप रंग भीना ।चिरंजीव प्रभु ने कियो, जग में दियो पुजाय ।जो कोई निश्चय कर के ध्यावे, ताकी करो सहाय ।कष्ट सब भक्तन का टाला ॥ कृपा कर…भक्तजन चरण कमल सेवे, जात आत सालासर देवे ।ध्वजा नारियल भोग देवे, मनोरथ सिद्धि कर लेवे ।कारज सारों भक्त के, सदा करो कल्याण ।विप्र निवासी लक्ष्मणगढ़ के, बालकृष्ण धर ध्यान ।नाम की जपे सदा माला ॥ कृपा कर…श्रीरामरक्षा स्तोत्रम्
भगवान श्री राम का ध्यानध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थंपीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् ।वामांकारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभंनानालंकारदीप्तं दधतमुरूजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥स्तोत्रम्चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥1॥ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्॥2॥सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम्।स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्॥3॥रामरक्षां पठेत् प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥4॥कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती ।घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥5॥जिह्वां विद्यानिधि: पातु कण्ठं भरतवन्दित: ।स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥6॥करौ सीतापति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित् ।मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥7॥सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: ।ऊरू रघूत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत् ॥8॥जानुनी सेतुकृत पातु जंघे दशमुखान्तक: ।पादौ विभीषणश्रीद: पातु रामोऽखिलं वपु: ॥9॥एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठेत् ।स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥10॥पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिण:न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥11॥रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन् ।नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥12॥जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्धय: ॥13॥वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्।अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥14॥आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: ।तथा लिखितवान् प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥15॥आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम् ।अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान् स न: प्रभु: ॥16॥तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥17॥फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥18॥शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥19॥आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषंगसंगिनौ ।रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रत: पथि सदैव गच्छताम् ॥20॥संनद्ध: कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।गच्छन् मनोरथान् नश्च राम: पातु सलक्ष्मण: ॥21॥रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघूत्तम: ॥22॥वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम:जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेयपराक्रम: ॥23॥इत्येतानि जपन् नित्यं मद्भक्त: श्रद्धयान्वित: ।अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशय: ॥24॥रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् ।स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरा: ॥25॥रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरंकाकुत्स्थं करुणार्णवंगुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिंवन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥27॥श्रीराम राम रघुनन्दन राम रामश्रीराम राम भरताग्रज राम रामश्री राम राम रणकर्कश राम रामश्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥28॥श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामिश्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामिश्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥29॥माता रामो मत्पिता रामचन्द्र:स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्र:सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर्नान्यंजाने नैव जाने न जाने ॥30॥दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा ।पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥31॥लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् ।कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥32॥मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥33॥कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥34॥आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥35॥भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम् ।तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥36॥रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजेरामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहंरामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥37॥राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥38॥
***
॥इति श्रीरामरक्षा स्तोत्रम्॥
---------------------------------
Subscribe to:
Posts (Atom)
